कलंक मीडिया

विशेष। भारत जैसे एक लोकतान्त्रिक गणराज्य में मीडिया की वर्तमान स्थिति ऐतिहासिक निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीते समय की अपेक्षा शिक्षा का प्रसार हुआ है, लेकिन शिक्षा ने लोगों के रहन-सहन का तरीका तो जरूर बदला है, मगर लोगों की मानसिकता को और भी कुत्सित कर दिया है। हालांकि शत प्रतिशत तो नहीं, लेकिन फिर भी भ्रष्ट मीडिया बहुमत में है। ईमानदारी और निष्पक्षता से पत्रकारिता करने का साहस गिने चुने लोगों में ही है, जो संघर्ष कर रहे हैं। देश के वर्तमान हालात भी इतिहास से भी कहीं ज्यादा ख़राब हैं। हम अब अधिक गुलाम हैं। पहले अंग्रेजों के रहे और आज तो अपनों के ही हैं। देश की आजादी में जितना योगदान गांधी, सुभाष, भगतसिंह, आजाद, बिस्मिल, तिलक, जैसे सेनानियों का रहा है, उतना ही बड़ा योगदान इस लड़ाई में कलम का रहा है। मगर आज कलम की जगह कम्प्यूटर ने ले ली है, जो सोचता विचारता कुछ भी नहीं है। कलम की पहुंच 100 लोगों तक होती थी, लेकिन कम्प्यूटर की पहुंच 100000, लोगों तक है। ज़रा सी देर भी नहीं लगती है सच्चाई पीछे ही रह जाती है और अफवाहों के तूफान पूरे के पूरे शहर उजाड़ कर रख देते हैं। आज राजनीति में गंदगी है, मगर मीडिया को नहीं दिखती, आज समाज में बेरोजगारी है, मगर मीडिया को नहीं दिखती, आज देश महंगाई है, मगर मीडिया को नहीं दिखती, अर्थव्यवस्था फर्श पर है, मगर मीडिया को नहीं दिखती…… आखिर क्यों……. अपने कांधों पर जो ज़िम्मेदारियां ली हुई हैं, उनका ख्याल क्यों नहीं है। शिक्षित होकर, सब कुछ आंखों से देखकर भी अफवाहों को क्यों बेंच रहे हो…?

Published by S V Raj

Social Thinker

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